Resolution no. 2 : Read
a book. Book means book, printed on paper, not on my laptop or cell phone
screen. Although I still love the soft and smooth touch of fresh print or the
smell of the old yellowish paper, but, somehow, something is lost in my head. I
find it difficult to carry it in my hands. While travelling, the first thing I
do after boarding is to open my carry-bag and pull a hardcover out, placing it
in my seat-pocket. And I never open it. I really feel sad about it and find
myself helpless. Not anymore. Peek-a-boo; means pick a book and open it and
read it. Period.
Saturday, December 31, 2016
Friday, December 30, 2016
बोलना कम, सुनना ज़्यादा
क़रार नम्बर १ : मौन व्रत धारण करूँगा। जैसा कि कल की पोस्ट
पर किसी दोस्त के भेस में छुपे दुश्मन ने सलाह तो दी है (कन्या राशि वाले के मौन
व्रत की सलाह देने वाला दुश्मन ही हो सकता है), मगर यह नहीं बताया कि धारण कब करना है।
चलो इतना तो कर ही सकता हूँ कि जब उनसे बात होगी, या फोन आयेगा तब तो कर ही लूँगा। वैसे
इसको थोड़ा सा बदल दूँ, तो ख़्याल बुरा भी नहीं है ~
क़रार नम्बर १ : कम बोलूँगा। कल से बेकार की बक बक किये जा
रहा हूँ। बचपन से सुनता आया हूँ कि बहुत बोलना अहमक़ होने की निशानी है। मगर क्या
करूँ? हर रोज़ एक दो छोटे अहमक़ (छोटे इस लिये कि वह कम बोलते हैं)
मुझ बड़े अहमक़ की बक बक सुनने चले आते हैं। कितना कहता हूँ कि बख़्श दो। मगर नहीं।
बैठे रहते हैं – “ज्ञान” पाने के लिये। वह बोलते कम हैं, और सुनते ज़्यादा हैं; तो टेकनिकली ज्ञानी तो वह हुये। सो क़रार
नम्बर एक – अब मैं ज्ञानी बनूँगा। इस साल बोलूँगा कम, और सुनूंगा ज़्यादा।
Wednesday, December 28, 2016
नये साल का रिज़ॉल्यूशन
लोग पूछ रहे हैं आप का नये साल का रिज़ॉल्यूशन क्या है? कोई मुझे बता दे (प्लीज़) यह रिज़ॉल्यूशन होता क्या है? हमारे बचपन में तो मुझे याद नहीं कि नये साल का कोई क़रारनामा साईन होता था। अंग्रेज़
तो तब भी मरते रहे होंगे। मगर तब तो किसी पर किसी अंग्रेज़ का भूत नहीं सवार हुआ। अब क्या हो गया है? इस लिये और भी उलझन होती है कि अगर हम कोई नेक ख़्याल अपने रिज़ॉल्यूशन नामी क़रारनामे में शामिल कर भी लें, फिर वह काम तो हम से हरगिज़ नहीं होने वाला। क्या बेवक़ूफ़ी है। मगर हम जो इंडियन होने पर प्राउड फ़ील करते हैं, मगर भारतीय होकर शर्मिंदा हो जाते हैं, हम से कोई अक़लमंदी की बात की
उम्मीद भी कैसे कर सकता है। अब बीइंग एन अहमक़, अगर मैं अपने रिज़ॉल्यूशन्स की लिस्ट बनाऊँ भी, उसमें किसी काम की बात के होने का कोई
सवाल ही नहीं उठता। तो बनाने का फ़ाएदा ही क्या? मगर उनका क्या करूँ जो दिन रात दिमाग़
खाते हैं, और अगले दस दिन तक और खाते रहेंगे – आप का रीजालूशन क्या
है?
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