Sunday, February 26, 2017

अमीर बनने के आसान तरीक़े – १ : अपना नाम अमीर रख लें

हाँ तो साहेबान, क़दरदान, लीजिये पेशे ख़िदमत हैं अमीर बनने के कुछ बड़े आसान तरीक़े। सुनने में यह तरीक़े आप को अजीब ज़रूर लग सकते हैं। क्योंकि अभी तक आप ने जो भी तरीक़े जाने हैं, वो बड़ी मेहनत वाले हैं। और वह तरीक़े बड़े बड़े लोगों ने बताये हैं। मगर जितने समय में आप उन तरीकों से अमीर बनेंगे, उतने ही समय में इनसे भी बन जायेंगे। या शायद उससे कम समय में, क्योंकि आप को मालूम ही न चलेगा कि कब, धीरे धीरे, आहिस्ता से आप का जीवन बदल गया। आज हाज़िर है तरीक़ा नंबर १ –

अपना नाम अमीर रख लें। सुनने में मज़ाक़ लग रहा है न। मज़ाक़ ही है। और मज़ाक़ में ही करना है। औफ़िशियली ऑन पेपर नहीं बदलना है। किसी भी ऐसे नाम को चुन लें, जो आप को अमीर होने की फीलिङ्ग देता हो। यह किसी व्यक्ति का नाम भी हो सकता है जो धन के मामले में आप का आइडियल हो। अपने दोस्तों, घर के लोगों या जो लोग भी आप के क़रीबी हैं, आप के वेल-विशर हैं, उनसे कहें आप को उसी नाम से पुकारें। अब सब से ज़रूरी बातजब भी आप को उस नाम से पुकारा जाये; उसे महसूस करें। हमेशा इस बात को जानें कि यह आप का नाम नहीं है। आप को अमीर या धनवान इस लिये पुकारा जा रहा है, क्योंकि आप हैं। अपने दिल में उस फीलिङ्ग को लायें, जो उस समय होगी जब आप असल में अमीर या धनवान होंगे।

यक़ीन जानिये, आप के बाहर की दुनिया धीरे धीरे बदल जायेगी। और आप को मालूम भी न चलेगा। क्योंकि अंदर से, अपने दिल में तो आप हमेशा से धनवान थे।

बहुत जल्दी हम हाज़िर होंगे अगले तरीक़े के साथ। आज, यहाँ तक के साथ के लिये आप का बहुत बहुत शुक्रिया। ख़ुश रहिये। मस्त रहिये। अमीर हो जाईये। आ’हाँ; आप हैं

Saturday, December 31, 2016

Read A Book


Resolution no. 2 : Read a book. Book means book, printed on paper, not on my laptop or cell phone screen. Although I still love the soft and smooth touch of fresh print or the smell of the old yellowish paper, but, somehow, something is lost in my head. I find it difficult to carry it in my hands. While travelling, the first thing I do after boarding is to open my carry-bag and pull a hardcover out, placing it in my seat-pocket. And I never open it. I really feel sad about it and find myself helpless. Not anymore. Peek-a-boo; means pick a book and open it and read it. Period.

Friday, December 30, 2016

बोलना कम, सुनना ज़्यादा



क़रार नम्बर १ : मौन व्रत धारण करूँगा। जैसा कि कल की पोस्ट पर किसी दोस्त के भेस में छुपे दुश्मन ने सलाह तो दी है (कन्या राशि वाले के मौन व्रत की सलाह देने वाला दुश्मन ही हो सकता है), मगर यह नहीं बताया कि धारण कब करना है। चलो इतना तो कर ही सकता हूँ कि जब उनसे बात होगी, या फोन आयेगा तब तो कर ही लूँगा। वैसे इसको थोड़ा सा बदल दूँ, तो ख़्याल बुरा भी नहीं है ~

क़रार नम्बर १ : कम बोलूँगा। कल से बेकार की बक बक किये जा रहा हूँ। बचपन से सुनता आया हूँ कि बहुत बोलना अहमक़ होने की निशानी है। मगर क्या करूँ? हर रोज़ एक दो छोटे अहमक़ (छोटे इस लिये कि वह कम बोलते हैं) मुझ बड़े अहमक़ की बक बक सुनने चले आते हैं। कितना कहता हूँ कि बख़्श दो। मगर नहीं। बैठे रहते हैं – ज्ञान पाने के लिये। वह बोलते कम हैं, और सुनते ज़्यादा हैं; तो टेकनिकली ज्ञानी तो वह हुये। सो क़रार नम्बर एक – अब मैं ज्ञानी बनूँगा। इस साल बोलूँगा कम, और सुनूंगा ज़्यादा।

Wednesday, December 28, 2016

नये साल का रिज़ॉल्यूशन



लोग पूछ रहे हैं आप का नये साल का रिज़ॉल्यूशन क्या है? कोई मुझे बता दे (प्ली) यह रिज़ॉल्यूशन होता क्या है? हमारे बचपन में तो मुझे याद नहीं कि नये साल का कोई क़रारनामा साईन होता था। अंग्रेज़ तो तब भी मरते रहे होंगे। मगर तब तो किसी पर किसी अंग्रेज़ का भूत नहीं सवार हुआ। अब क्या हो गया है? इस लिये और भी उलझन होती है कि अगर हम कोई नेक ख़्याल अपने रिज़ॉल्यूशन नामी क़रारनामे में शामिल कर भी लें, फिर वह काम तो हम से हरगिज़ नहीं होने वाला। क्या बेवक़ूफ़ी है। मगर हम जो इंडियन होने पर प्राउड फ़ील करते हैं, मगर भारतीय होकर शर्मिंदा हो जाते हैं, हम से कोई अक़लमंदी की बात की उम्मीद भी कैसे कर सकता है। अब बीइंग एन अहमक़, अगर मैं अपने रिज़ॉल्यूशन्स की लिस्ट बनाऊँ भी, उसमें किसी काम की बात के होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। तो बनाने का फ़ाएदा ही क्या? मगर उनका क्या करूँ जो दिन रात दिमाग़ खाते हैं, और अगले दस दिन तक और खाते रहेंगे – आप का रीजालूशन क्या है?

Saturday, January 7, 2012

ओ मेरे डॉक्टर....

तबीयत ख़राब तो न थी। मगर ठीक भी न थी। या शायद फ़र्क़ ही मालूम न था। कुछ बुख़ार सा रहा करता था। एक बेचैनी सी, जो सोने न देती थी। सारे हकीम, सारे वैद्य आज़मा चुका था। कुछ फ़ाएदा नज़र न आता था। बेचैनी बढ़ती जाती थी। बुख़ार कम न होता था। न जाने कहाँ कहाँ भटका किया था, कि कहीं कोई अच्छा डॉक्टर मिल जाता। गली, गली; शहर, शहर; दरिया, सेहरा॥ एक रोज़ यूं ही कहीं भटकता फिरा था; कि देखा दूर एक पहाड़ पर से एक शख़्स चला आता है। न जाने दिल की आवाज़ थी, या उसके चेहरे के नूर का असर, क़दम रुक गये। लगा, कि इसको मेरी बीमारी का इलाज ज़रूर मालूम होगा। न मालूम हो, तो यह किसी अच्छे डॉक्टर का पता ज़रूर जानता होगा।

और फिर तो कमाल ही हो गया। उसने मुझे बताया कि वह तो मेरे लिए ही आया है। वह सबसे अच्छे डॉक्टर को जानता है। और उस डॉक्टर ने उसे मेरे लिए ही भेजा है। मैंने कहा बुख़ार है, बेचैनी सी रहती है। वह बोला लिख लो। क्रोसीन खाना। हर तीन घंटे पर। मैंने कहा यह तो दिन में पाँच बार हो गई। वह बोला ठीक। लिख लो पाँच बार क्रोसीन खाना। फिर कभी बदन दर्द ज़्यादा हो, तो ब्रूफ़ेन खा लेना। और रात में जब आख़िरी दवा लेना तो एक कॉम्पोज़ भी खा लेना। बेचैनी भी न रहेगी। और वह अपने रास्ते बढ़ गया। उसे और भी बीमारों का इलाज करना होगा। मगर मुझे तो मेरी शिफ़ा का नुस्ख़ा मिल गया।

वह दिन शायद मेरी ज़िंदगी का सब से खुशी का दिन था। मुझे निजात का फ़ार्मूला मिल गया था। मैं भागा भागा घर आया। एक अच्छे चिकने काग़ज़ पर खूबसूरती से दवाएं लिखलीं। घर का एक कोना साफ़ किया। साफ़ दरी डाली। नुस्ख़ा संभाल कर सामने रखा, और बार बार पढ़ा। मत पूछो कि दिल को कितनी ठंडक पहुंची। मगर बुख़ार कम न हुआ। दिल की बेचैनी और बढ़ गई। मगर मुझे अपने डॉक्टर पर यक़ीन था। जो शख़्स उसकी तरफ़ से आया था, उस पर यक़ीन था। मैं दिन में पाँच बार पूरे यक़ीन से पढ़ता था। क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ भी खाओ। मगर बुख़ार ठीक न होता था।

एक दिन एक दोस्त मिलने आया। मैं उस वक़्त अपना नुस्ख़ा पढ़ रहा था। वह बोला, यह क्या करते हो। ऐसे कहीं इलाज होता है। किस डॉक्टर के चक्कर में पड़ गए। तेरा डॉक्टर फ़र्ज़ी है। जिसने तुम्हें उसके बारे में बताया, वह कोई ठग होगा। मेरा तो ख़ून खौल गया। उठाई लाठी और उसका सर फोड़ दिया। उसे उठा कर घर से बाहर फेंक दिया, कि जा अपने डॉक्टर के पास। जा, उस से अपने सर का इलाज करा। मेरे डॉक्टर को फ़र्ज़ी कहता है। और सजदे में गिर कर रो रो अपने डॉक्टर से माफ़ी मांगी, कि किस जाहिल से दोस्ती कर रखी थी।

उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोस्त, मेरे हमदर्द, मेरे अपने कितनी ग़लती कर रहे हैं। और सब से बड़ी ग़लती तो मेरी है, कि मैं सही डॉक्टर को जानता हूँ, और उनको नहीं बताता। बस, मेरी आँखें खुल गईं। मैं समझ गया कि मुझे फ़ाएदा क्यों नहीं हो रहा था। मैं मतलबी था। सिर्फ़ अपना भला सोच रहा था। मेरे पास सही दवा थी। और मैंने दूसरों को बताई ही नहीं। मैंने फ़ौरन अपने नुस्ख़े की बहुत ही कापियाँ करीं, और घर से निकाल पड़ा। एक एक को बताया। बुख़ार है, क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ खाओ। यह अच्छे डॉक्टर की बताई हुई दवा है। वही एक सच्चा डॉक्टर है।

""ऐ मेरे डॉक्टर, मैं रोज़ तेरे नाम की माला जपता हूँ। तुझे सजदे करता हूँ। अब तो दिन में पाँच बार क्या, दिन रात कहता रहता हूँ – क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ खाओ। क्रोसीन, क्रोसीन, क्रोसिन.... हद तो यह है, कि मुझे कितने ही लोग बता चुके हैं, कि मैंने तेरे बंदे का बताया हुआ इलाज, तेरा बताया हुआ इलाज, जो उन लोगों को बताया था, उससे उनके बुख़ार ठीक हो गये। उनकी बेचैनी दूर हो गई। मगर मेरा बुख़ार क्यों कम नहीं होता। मेरी बेचैनी क्यों बढ़ती जाती है॥""

कोई मुझे बता दे। प्लीज़….. 

Thursday, December 15, 2011

ख़ुशनसीब हैं वो, जिनको है मिली, ये बहार ज़िंदगी में

Love….. ये लव क्या है जी। मैं कोई अंग्रेज़ की औलाद तो हूँ नहीं। और लव से बनता क्या है? लवली। 117B वाली शर्मा आंटी की कुतिया!!! तौबा। लव को हटाओ जी।

प्रेम...... प्रेम चोपड़ा। क्या मुसीबत है। चोपड़ा सर ने प्रेम का नाम ही बदनाम कर दिया है। और प्रेम से क्या बनता है? प्रेमी। यानि कि मैं। मैं क्या? मैं तो हूँ ही नहीं। प्रेम भी हटाओ।

मुहब्बत लाओ भाई। नहीं, हटाओ। शुरू से ही मज़ा नहीं आया। एक तो लंबू, ऊपर से अटकू।

इश्क़..... नहीं, इश्क़ नहीं। इश्क़ तो सिर्फ़ उस से है। वही जो एक इश्क़ के क़ाबिल है। वह जिसके इश्क़ में मैं मुसलमां से काफ़िर हो गया। मेरा मज़हब कहता था – हम उसी से आए हैं, और उसी को लौट जाएंगे। मगर मैं मानता हूँ – मैं उसी में था, उसी में हूँ, और उसी में रहूँगा। क्या आना क्या, और जाना क्या। इश्क़ भी हटाओ। फिर क्या करें?

प्यार..... हाँ, यह कुछ है। अरे! यही तो सब कुछ है। प्यार से बना प्यारी। मेरी प्यारी। यहाँ मैं नहीं हूँ। यहाँ वह है। प्यारी। मेरी प्यारी, बस। अल्लाह ने मुझे यह ज़िंदगी दी ही थी इसी लिये। कि मैं अपनी प्यारी को तलाश करूँ, उसको पाऊँ, और फिर खो दूँ। पाना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं इश्क़ को समझ सकूँ। अपने  ख़ालिक़ की क़ुदरत की ताक़त को समझ सकूँ। और उस से सही माने में इश्क़ कर सकूँ। और खोना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं फिर प्यारी के प्यार में ही डूब कर उस से बदगुमान न हो रहूँ। मैं  उसे ही न भूल जाऊँ जो प्यारी को बनाने वाला है, और मेरे दिल में उसके लिये प्यार जगाने वाला है। जो मुझे दिल्ली ले गया। जहां वह मेरा इंतेज़ार कर रही थी। न मैं वहाँ का, न वह वहाँ की। हम कहीं और भी मिल सकते थे। लेकिन नहीं। वह मुक़द्दस ज़मीन जो सुल्तान जी और अमीर ख़ुसरो जैसे उसके आशिक़ों के आंसुओं से पाक हुई है, हमें वहीं पर मिलना था। ताकि हम  उसके इश्क़ को समझें, न कि एक दूसरे को। आज मैं उसे एक भी सजदा नहीं करता। मगर मैं जानता हूँ, कि मैं सारी उम्र सजदे में पड़ा रहूँ, तो भी वह कम है, उन चंद दिनों की बहार के लिये ही, जो उसने मुझे दी। प्यार

Thursday, October 6, 2011

ग़म दिये मुस्तक़िल.....


मेरा सितारा कई रोज़ से नज़र नहीं आ रहा था। मुझे फ़िक्र होने लगी थी।

लंबा वक़्फ़ा बीत चुका था मुझे सफ़र में। जब चला था तो जल्दी लौटने का इरादा भी न था, सो सारा इंतेज़ाम देख रख कर चला था। अभी तक तो सब ठीक ही ठाक चल रहा था। कभी कभी रौशनी कुछ मद्धम ज़रूर पड़ती थी, मगर ऐसा तो चलता ही रहता है। या कभी इतनी कम हो जाती थी कि कुछ दिनों तक वह यहाँ से नज़र ही नहीं आता था। बहुत दूर भी तो निकाल आया था मैं। लेकिन इतने लंबे समय तक तो कभी वह नज़रों से ओझल नहीं हुआ था। एक रात चौपाटी पर रेत पर लेटा अपना तारा ढूँढने की कोशिश कर ही रहा था कि हवाओं में एक आवाज़ गूँजती सुनाई पड़ी -

"ग़म दिये मुस्तक़िल, कितना नाज़ुक है, दिल ये न जाना......."

वह मेरे नज़दीक आ चुका था। कोट हाथों में झूल रहा था। पैर में जूते न थे, और सर से टोपी ग़ायब थी। अंधेरी रात में तारों की हल्की सी रौशनी में मुझे वह एक परछाईं ही नज़र आ रहा था।

"मुझे कुछ वक़्त के लिए जाना होगा कुन्दन," मैंने कहा, "तुम भी चलो न मेरे साथ।"

"मेरे इस दर्द को साथ ले जाओ... ये मुझे रात रात भर सोने नहीं देता...," वह ठहर ठहर कर बोल रहा था, "आई (उसकी माँ) के दामन में कुछ घड़ियाँ सुकून से गुज़ार तो लेता हूँ। वहाँ वो मिले, ना मिले।"

मैंने कोई जवाब न दिया। क्या जवाब दे ही सकता था। मगर उसकी माँ के दामन से मुझे अपना उपवन याद आ गया। हवाओं की सनसन और फिज़ाओं की झंझन मेरे मस्तिष्क में गुनगुनाने लगी। मैं ऊपर उस दिशा में बढ़ चला जहां मेरा तारा हुआ करता था। नीचे फिज़ाओं में उसकी आवाज़ तैर रही थी -

"उठके वो चल दिये, कहते ही रह गये, हम फ़साना....."

मैंने नीचे की तरफ देखा। उसका कोट वहीं पड़ा था, मगर वह नज़र नहीं आया। मैंने फिर ऊपर देखा। तारा तो पहले से ही ग़ायब था। मैंने अपने दिल में एक टीस सी महसूस की। एक मैं हूँ, एक घर नहीं रहा जिसके पास। एक वह है, जो लाखों दिलों में रहता है.... कमबख़्त।