Saturday, January 7, 2012

ओ मेरे डॉक्टर....

तबीयत ख़राब तो न थी। मगर ठीक भी न थी। या शायद फ़र्क़ ही मालूम न था। कुछ बुख़ार सा रहा करता था। एक बेचैनी सी, जो सोने न देती थी। सारे हकीम, सारे वैद्य आज़मा चुका था। कुछ फ़ाएदा नज़र न आता था। बेचैनी बढ़ती जाती थी। बुख़ार कम न होता था। न जाने कहाँ कहाँ भटका किया था, कि कहीं कोई अच्छा डॉक्टर मिल जाता। गली, गली; शहर, शहर; दरिया, सेहरा॥ एक रोज़ यूं ही कहीं भटकता फिरा था; कि देखा दूर एक पहाड़ पर से एक शख़्स चला आता है। न जाने दिल की आवाज़ थी, या उसके चेहरे के नूर का असर, क़दम रुक गये। लगा, कि इसको मेरी बीमारी का इलाज ज़रूर मालूम होगा। न मालूम हो, तो यह किसी अच्छे डॉक्टर का पता ज़रूर जानता होगा।

और फिर तो कमाल ही हो गया। उसने मुझे बताया कि वह तो मेरे लिए ही आया है। वह सबसे अच्छे डॉक्टर को जानता है। और उस डॉक्टर ने उसे मेरे लिए ही भेजा है। मैंने कहा बुख़ार है, बेचैनी सी रहती है। वह बोला लिख लो। क्रोसीन खाना। हर तीन घंटे पर। मैंने कहा यह तो दिन में पाँच बार हो गई। वह बोला ठीक। लिख लो पाँच बार क्रोसीन खाना। फिर कभी बदन दर्द ज़्यादा हो, तो ब्रूफ़ेन खा लेना। और रात में जब आख़िरी दवा लेना तो एक कॉम्पोज़ भी खा लेना। बेचैनी भी न रहेगी। और वह अपने रास्ते बढ़ गया। उसे और भी बीमारों का इलाज करना होगा। मगर मुझे तो मेरी शिफ़ा का नुस्ख़ा मिल गया।

वह दिन शायद मेरी ज़िंदगी का सब से खुशी का दिन था। मुझे निजात का फ़ार्मूला मिल गया था। मैं भागा भागा घर आया। एक अच्छे चिकने काग़ज़ पर खूबसूरती से दवाएं लिखलीं। घर का एक कोना साफ़ किया। साफ़ दरी डाली। नुस्ख़ा संभाल कर सामने रखा, और बार बार पढ़ा। मत पूछो कि दिल को कितनी ठंडक पहुंची। मगर बुख़ार कम न हुआ। दिल की बेचैनी और बढ़ गई। मगर मुझे अपने डॉक्टर पर यक़ीन था। जो शख़्स उसकी तरफ़ से आया था, उस पर यक़ीन था। मैं दिन में पाँच बार पूरे यक़ीन से पढ़ता था। क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ भी खाओ। मगर बुख़ार ठीक न होता था।

एक दिन एक दोस्त मिलने आया। मैं उस वक़्त अपना नुस्ख़ा पढ़ रहा था। वह बोला, यह क्या करते हो। ऐसे कहीं इलाज होता है। किस डॉक्टर के चक्कर में पड़ गए। तेरा डॉक्टर फ़र्ज़ी है। जिसने तुम्हें उसके बारे में बताया, वह कोई ठग होगा। मेरा तो ख़ून खौल गया। उठाई लाठी और उसका सर फोड़ दिया। उसे उठा कर घर से बाहर फेंक दिया, कि जा अपने डॉक्टर के पास। जा, उस से अपने सर का इलाज करा। मेरे डॉक्टर को फ़र्ज़ी कहता है। और सजदे में गिर कर रो रो अपने डॉक्टर से माफ़ी मांगी, कि किस जाहिल से दोस्ती कर रखी थी।

उसी वक़्त मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोस्त, मेरे हमदर्द, मेरे अपने कितनी ग़लती कर रहे हैं। और सब से बड़ी ग़लती तो मेरी है, कि मैं सही डॉक्टर को जानता हूँ, और उनको नहीं बताता। बस, मेरी आँखें खुल गईं। मैं समझ गया कि मुझे फ़ाएदा क्यों नहीं हो रहा था। मैं मतलबी था। सिर्फ़ अपना भला सोच रहा था। मेरे पास सही दवा थी। और मैंने दूसरों को बताई ही नहीं। मैंने फ़ौरन अपने नुस्ख़े की बहुत ही कापियाँ करीं, और घर से निकाल पड़ा। एक एक को बताया। बुख़ार है, क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ खाओ। यह अच्छे डॉक्टर की बताई हुई दवा है। वही एक सच्चा डॉक्टर है।

""ऐ मेरे डॉक्टर, मैं रोज़ तेरे नाम की माला जपता हूँ। तुझे सजदे करता हूँ। अब तो दिन में पाँच बार क्या, दिन रात कहता रहता हूँ – क्रोसीन खाओ। ब्रूफ़ेन खाओ। कॉम्पोज़ खाओ। क्रोसीन, क्रोसीन, क्रोसिन.... हद तो यह है, कि मुझे कितने ही लोग बता चुके हैं, कि मैंने तेरे बंदे का बताया हुआ इलाज, तेरा बताया हुआ इलाज, जो उन लोगों को बताया था, उससे उनके बुख़ार ठीक हो गये। उनकी बेचैनी दूर हो गई। मगर मेरा बुख़ार क्यों कम नहीं होता। मेरी बेचैनी क्यों बढ़ती जाती है॥""

कोई मुझे बता दे। प्लीज़…..