Thursday, October 6, 2011

ग़म दिये मुस्तक़िल.....


मेरा सितारा कई रोज़ से नज़र नहीं आ रहा था। मुझे फ़िक्र होने लगी थी।

लंबा वक़्फ़ा बीत चुका था मुझे सफ़र में। जब चला था तो जल्दी लौटने का इरादा भी न था, सो सारा इंतेज़ाम देख रख कर चला था। अभी तक तो सब ठीक ही ठाक चल रहा था। कभी कभी रौशनी कुछ मद्धम ज़रूर पड़ती थी, मगर ऐसा तो चलता ही रहता है। या कभी इतनी कम हो जाती थी कि कुछ दिनों तक वह यहाँ से नज़र ही नहीं आता था। बहुत दूर भी तो निकाल आया था मैं। लेकिन इतने लंबे समय तक तो कभी वह नज़रों से ओझल नहीं हुआ था। एक रात चौपाटी पर रेत पर लेटा अपना तारा ढूँढने की कोशिश कर ही रहा था कि हवाओं में एक आवाज़ गूँजती सुनाई पड़ी -

"ग़म दिये मुस्तक़िल, कितना नाज़ुक है, दिल ये न जाना......."

वह मेरे नज़दीक आ चुका था। कोट हाथों में झूल रहा था। पैर में जूते न थे, और सर से टोपी ग़ायब थी। अंधेरी रात में तारों की हल्की सी रौशनी में मुझे वह एक परछाईं ही नज़र आ रहा था।

"मुझे कुछ वक़्त के लिए जाना होगा कुन्दन," मैंने कहा, "तुम भी चलो न मेरे साथ।"

"मेरे इस दर्द को साथ ले जाओ... ये मुझे रात रात भर सोने नहीं देता...," वह ठहर ठहर कर बोल रहा था, "आई (उसकी माँ) के दामन में कुछ घड़ियाँ सुकून से गुज़ार तो लेता हूँ। वहाँ वो मिले, ना मिले।"

मैंने कोई जवाब न दिया। क्या जवाब दे ही सकता था। मगर उसकी माँ के दामन से मुझे अपना उपवन याद आ गया। हवाओं की सनसन और फिज़ाओं की झंझन मेरे मस्तिष्क में गुनगुनाने लगी। मैं ऊपर उस दिशा में बढ़ चला जहां मेरा तारा हुआ करता था। नीचे फिज़ाओं में उसकी आवाज़ तैर रही थी -

"उठके वो चल दिये, कहते ही रह गये, हम फ़साना....."

मैंने नीचे की तरफ देखा। उसका कोट वहीं पड़ा था, मगर वह नज़र नहीं आया। मैंने फिर ऊपर देखा। तारा तो पहले से ही ग़ायब था। मैंने अपने दिल में एक टीस सी महसूस की। एक मैं हूँ, एक घर नहीं रहा जिसके पास। एक वह है, जो लाखों दिलों में रहता है.... कमबख़्त।

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