Love….. ये लव क्या है जी। मैं कोई अंग्रेज़ की औलाद तो हूँ नहीं। और लव से बनता क्या है? लवली। 117B वाली शर्मा आंटी की कुतिया!!! तौबा। लव को हटाओ जी।
प्रेम...... प्रेम चोपड़ा। क्या मुसीबत है। चोपड़ा सर ने प्रेम का नाम ही बदनाम कर दिया है। और प्रेम से क्या बनता है? प्रेमी। यानि कि मैं। मैं क्या? मैं तो हूँ ही नहीं। प्रेम भी हटाओ।
मुहब्बत लाओ भाई। नहीं, हटाओ। शुरू से ही मज़ा नहीं आया। एक तो लंबू, ऊपर से अटकू।
इश्क़..... नहीं, इश्क़ नहीं। इश्क़ तो सिर्फ़ उस से है। वही जो एक इश्क़ के क़ाबिल है। वह जिसके इश्क़ में मैं मुसलमां से काफ़िर हो गया। मेरा मज़हब कहता था – हम उसी से आए हैं, और उसी को लौट जाएंगे। मगर मैं मानता हूँ – मैं उसी में था, उसी में हूँ, और उसी में रहूँगा। क्या आना क्या, और जाना क्या। इश्क़ भी हटाओ। फिर क्या करें?
प्यार..... हाँ, यह कुछ है। अरे! यही तो सब कुछ है। प्यार से बना प्यारी। मेरी प्यारी। यहाँ मैं नहीं हूँ। यहाँ वह है। प्यारी। मेरी प्यारी, बस। अल्लाह ने मुझे यह ज़िंदगी दी ही थी इसी लिये। कि मैं अपनी प्यारी को तलाश करूँ, उसको पाऊँ, और फिर खो दूँ। पाना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं इश्क़ को समझ सकूँ। अपने ख़ालिक़ की क़ुदरत की ताक़त को समझ सकूँ। और उस से सही माने में इश्क़ कर सकूँ। और खोना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं फिर प्यारी के प्यार में ही डूब कर उस से बदगुमान न हो रहूँ। मैं उसे ही न भूल जाऊँ जो प्यारी को बनाने वाला है, और मेरे दिल में उसके लिये प्यार जगाने वाला है। जो मुझे दिल्ली ले गया। जहां वह मेरा इंतेज़ार कर रही थी। न मैं वहाँ का, न वह वहाँ की। हम कहीं और भी मिल सकते थे। लेकिन नहीं। वह मुक़द्दस ज़मीन जो सुल्तान जी और अमीर ख़ुसरो जैसे उसके आशिक़ों के आंसुओं से पाक हुई है, हमें वहीं पर मिलना था। ताकि हम उसके इश्क़ को समझें, न कि एक दूसरे को। आज मैं उसे एक भी सजदा नहीं करता। मगर मैं जानता हूँ, कि मैं सारी उम्र सजदे में पड़ा रहूँ, तो भी वह कम है, उन चंद दिनों की बहार के लिये ही, जो उसने मुझे दी। प्यार।
प्रेम...... प्रेम चोपड़ा। क्या मुसीबत है। चोपड़ा सर ने प्रेम का नाम ही बदनाम कर दिया है। और प्रेम से क्या बनता है? प्रेमी। यानि कि मैं। मैं क्या? मैं तो हूँ ही नहीं। प्रेम भी हटाओ।
मुहब्बत लाओ भाई। नहीं, हटाओ। शुरू से ही मज़ा नहीं आया। एक तो लंबू, ऊपर से अटकू।
इश्क़..... नहीं, इश्क़ नहीं। इश्क़ तो सिर्फ़ उस से है। वही जो एक इश्क़ के क़ाबिल है। वह जिसके इश्क़ में मैं मुसलमां से काफ़िर हो गया। मेरा मज़हब कहता था – हम उसी से आए हैं, और उसी को लौट जाएंगे। मगर मैं मानता हूँ – मैं उसी में था, उसी में हूँ, और उसी में रहूँगा। क्या आना क्या, और जाना क्या। इश्क़ भी हटाओ। फिर क्या करें?
प्यार..... हाँ, यह कुछ है। अरे! यही तो सब कुछ है। प्यार से बना प्यारी। मेरी प्यारी। यहाँ मैं नहीं हूँ। यहाँ वह है। प्यारी। मेरी प्यारी, बस। अल्लाह ने मुझे यह ज़िंदगी दी ही थी इसी लिये। कि मैं अपनी प्यारी को तलाश करूँ, उसको पाऊँ, और फिर खो दूँ। पाना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं इश्क़ को समझ सकूँ। अपने ख़ालिक़ की क़ुदरत की ताक़त को समझ सकूँ। और उस से सही माने में इश्क़ कर सकूँ। और खोना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं फिर प्यारी के प्यार में ही डूब कर उस से बदगुमान न हो रहूँ। मैं उसे ही न भूल जाऊँ जो प्यारी को बनाने वाला है, और मेरे दिल में उसके लिये प्यार जगाने वाला है। जो मुझे दिल्ली ले गया। जहां वह मेरा इंतेज़ार कर रही थी। न मैं वहाँ का, न वह वहाँ की। हम कहीं और भी मिल सकते थे। लेकिन नहीं। वह मुक़द्दस ज़मीन जो सुल्तान जी और अमीर ख़ुसरो जैसे उसके आशिक़ों के आंसुओं से पाक हुई है, हमें वहीं पर मिलना था। ताकि हम उसके इश्क़ को समझें, न कि एक दूसरे को। आज मैं उसे एक भी सजदा नहीं करता। मगर मैं जानता हूँ, कि मैं सारी उम्र सजदे में पड़ा रहूँ, तो भी वह कम है, उन चंद दिनों की बहार के लिये ही, जो उसने मुझे दी। प्यार।