Friday, April 8, 2011

माना है कि तू गंगा माँ है

कुण्ड में पानी तो नहीं था. मगर ठीक बीच में एक दिये को दूसरे दिये के ऊपर इस तरह रखा गया था कि अँधेरे में नीचे वाला दिया ऊपर वाले दिये का प्रतिबिम्ब लग रहा था, और कुण्ड में पानी के होने का एहसास हो रहा था.

जब भी मैं यहाँ होता हूँ, हर शाम अँधेरा होने के बाद एक बार सती कुण्ड तक ज़रूर आता हूँ. न मालूम क्यों जो शांति मुझे घाट पर दूर तक जारी दीयों की कतारों या उनके गंगा जल में पड़ रहें प्रतिबिम्ब से नहीं मिलती, वह मुझे यहाँ सती कुण्ड में हर तरह फैले हुए दीयों से मिलती है. अक्सर यहाँ बहुत से लोग होते हैं, मगर अमूमन् कम रौशनी की वजह से कुछ साफ़ नज़र नहीं आता. बस हर तरफ दिये बिखरे होते हैं. मैं गेट के पास ही रुक जाता हूँ. अंदर नहीं जाता. दो दिये मेरे पास ही जल रहें होते हैं, और एक कतार सी शुरू होती है वहीँ से जो अंदर जाकर कुण्ड के किनारे किनारे गोलाई में फैल जाती है.

एक जगह और है जहाँ मैं अक्सर जाता हूँ. गंगा के किसी किनारे पर कोई जगह. मुझे यहाँ रास्तों के नाम नहीं पता. घाटों के नाम भी नहीं मालूम. ज़रूरत भी नहीं है मालूम करने की. मुझे जिससे काम है, उसे मैं पहचानता हूँ. उस का नाम जनता हूँ. वह मुझे हर तरफ मिल जाती है. जिस दिशा भी मैं जाऊं, वह खुद, या उसकी कोई नहर, या कोई धारा मौजूद है. उसका नाम गंगा है. वह हर तरफ अपनी हज़ार बाहें फैलाए मेरा इन्तेज़ार करती है. और मैं दीवानावार मदहोशी में किसी भी रास्ते निकाल जाऊं, वह मुझे मिल ही जाती है.

वह जगह कोई बनाया गया घाट नहीं है. किसी घाट से बाहर एक जगह पत्थर लुढ़क कर नदी में चले गए हैं, और उनमें रोक लगा कर उन्हें आगे जाने से रोक दिया गया है. सब से आगे के पत्थर तो मुख्य धारा में चले गए हैं, और कभी कभी धारा उनके ऊपर से गुज़रती है. वहाँ होने का मतलब है कि कोई भी एक गलती, या तो आप की, या पत्थर की, या पानी की; आप को धारा में खींच ले जायेगी. और फिर वापसी मुमकिन नहीं होगी. मैं उन्हीं पत्थरों पर जाकर बैठ जाता हूँ. और मैंने सिवाए अपने, कभी किसी और को वहाँ, मेरा मतलब उतना अंदर उन पत्थरों पर बैठे नहीं देखा.

गंगा का पानी अक्सर पूरे वेग से उन पत्थरों से टकराता है, और उछल कर मेरी तरफ आता है. मैं अक्सर अपने हाथ बढ़ा देता हूँ, जैसे उस पानी से कहता हूँ - आओ, मेरे हाथों को पकड़ कर दिखाओ. हाथों तक वह पहुंचे या न पहुंचे, मेरे पैरों को वह ज़रूर छूता हुआ चला जाता है. न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मुझे छू कर निकलने वाला पानी नहीं, कोई और है. किसी के लम्स का एहसास होता है, और हर बार यह एहसास बदल जाता है. हर हाथ दूसरा होता है. गंगा अपने हज़ार हाथों से मुझे पकड़ने की कोशिश करती है, और हर बार हाथ फिसल जाते हैं. मैं अक्सर हँसने लगता हूँ. कभी कभी तो ज़ोर से भी. बातें करता हूँ गंगा से. कभी उसे गंगा कहता हूँ, तो कभी गंगे, या कभी माँ पुकारता हूँ, या मैया. लेकिन मेरे लिये वह सिर्फ बहता पानी तो हरगिज़ नहीं है.

सच तो यह है कि मैं अक्सर भूल जाता हूँ कि मैं बहुत तेज़ धारा से लग कर, उसके अंदर बैठा हुआ हूँ. मैं उन हाथों में खो जाता हूँ. फिर अचानक मुझे पानी नज़र आता है. मुझे चक्कर सा महसूस होता है. और अचानक होश सा आ जाता है. शायद इसी लिये लोग वहाँ नहीं बैठते. वहाँ हर तरफ सिर्फ पानी ही नहीं है. कुछ और भी है. वह एक न एक दिन पकड़ ही लेगा मुझे शायद. और अपने साथ ले जायेगा. ले जाये न. मुझे कब ऐतराज़ है. मैं तो खुशी से साथ जाने को तैयार हूँ. इस दुनिया में जहाँ हर कोई साथ छोड़ कर जाने को तैयार बैठा रहता है. हर अपना चला जाता है. हर दोस्त धोका देता है. बारां ने किनारा कर लिया मुझ से. जिसको मैं अब भी इस दुनिया का सब से अच्छा दोस्त, सब से अच्छा इंसान मानता हूँ. और वह है. और वह भी छोड़ कर चली गई. तो ऐसे जहाँ में गंगा माँ मुझे साथ ले जाये, और वह भी हमेशा के लिये, तो इस से ज़्यादा मुझे क्या चाहिये.

जो स्वर्ग ने दी धरती को, मैं हूँ प्यार की वोही निशानी | 
मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी ||

Monday, April 4, 2011

हज़ारों इच्छाओं और लाखों लालसाओं के साथ

एक दिया बहता हुआ मेरी तरह आ रहा था. 

पानी का बहाव तो तेज़ था. मगर न जाने क्यूँ, दिया बहुत ही धीमी गति से बहता हुआ मेरी तरफ़ आ रहा था. या मुझे ऐसा लग रहा था. अभी कल शाम को भी तो जब मैं सिन्हद्वार पर गंगा के किनारे खड़ा हुआ था तब भी मुझे बहुत दूर एक दिया बहता हुआ आता दिखाई दिया था. उसकी गति तेज़ थी. शायद नदी का बहाव काफ़ी तेज़ था जो मुझे रात के अँधेरे में नज़र नहीं आ रहा था. और देखते ही देखते वह दिया गंगा की लहरों में खो गया. दिया क्या, मैंने तो केवल एक प्रकाश-बिंदु को अपनी ओर आते देखा था. वह पास आता हुआ भी बहुत दूर था, और दूर ही कहीं गंगा की लहरों में खो गया था.

आज अभी अँधेरा नहीं हुआ था. और मैं गंगा के किनारे पानी के बिलकुल क़रीब बैठा हुआ था. और फिर मुझे एक दिया नज़र आया. जो आहिस्ता आहिस्ता नदी की लहरों पर हिचकोले खाता हुआ मेरी तरफ चला आ रहा था. वह बहुत दूर नहीं था, और मुझे उसकी लौ टिमटिमाती हुई नज़र आ रही थी. मेरे दिल में बात आई – ये डूबने न पाये. काश कल की तरह फिर न हो. यह दिया जलता हुआ मेरे पास से गुज़रे. मगर उसकी चाल तो ऐसी थी, कि जैसे वह मेरे पास आना ही नहीं चाहता था. बार बार बेचैन होकर मैं इधर उधर देखने लगता था. गंगा की लहरों में नज़रें गड़ा देता था. मेरे पास से फूल बहते हुए गुज़र रहें थे. एक बहुत ही सुन्दर सा फूलों से भरा टोकरा मेरी तरफ आया, और मेरे बहुत ही पास से निकाल गया. मैं देर तक उसे देखता रहा. फिर मैंने अपने इन्तेज़ार की तरफ आँखें घुमाईं. वह वहाँ नहीं था. वह गंगा की लहरों में खो चुका था.

जब ये दिये डूब जाते हैं, तो कहीं मेरे दिल के किसी कोने में भी कुछ डूब सा जाता है. न जाने किसकी क्या उम्मीद, क्या अरमान जुड़े हुए होंगे उस दिये के साथ. पता नहीं वह उम्मीदें, वह अरमान पूरे भी होंगे, या नहीं. वह दिया तो गंगा के विशाल आँचल में समा गया. माँ ने उसे अपने सीने में छुपा तो लिया, स्वीकार तो कर लिया. मगर माँ अपने बच्चे को हर चीज़ दे तो नहीं देती.  माँ तो पहले से ही जानती है कि उसके बच्चों को क्या चाहिये, और वह उन्हें देती भी है. मगर बच्चा भी क्या करे. उसके छोटे से मन में इच्छाएँ उमड़ती रहती हैं. लालसाएँ दबती ही नहीं. वह रोता रहता है, बिलखता है, आँसू बहाता है. और माँ अपने कामों में मगन रहती है. बच्चा थक हार कर सो जाता है. मैं भी किसी दिन यहीं कहीं सो जाऊँगा. माँ के आँचल में छुप कर. हज़ारों इच्छाओं और लाखों लालसाओं के साथ. मगर जब तक जिस्म में जान है, अरमान बाकी हैं, मांगता ही रहूँगा. पुकारता ही रहूँगा, अपनी आवाज़ के खामोश हो जाने तक. कल शाम जब दिया डूबा तो न जाने कहाँ से क़तील की बहुत पुरानी लाईनें याद आ गईं -

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफुक़ में डूब गया |  रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी शैदाई की.