Thursday, December 15, 2011

ख़ुशनसीब हैं वो, जिनको है मिली, ये बहार ज़िंदगी में

Love….. ये लव क्या है जी। मैं कोई अंग्रेज़ की औलाद तो हूँ नहीं। और लव से बनता क्या है? लवली। 117B वाली शर्मा आंटी की कुतिया!!! तौबा। लव को हटाओ जी।

प्रेम...... प्रेम चोपड़ा। क्या मुसीबत है। चोपड़ा सर ने प्रेम का नाम ही बदनाम कर दिया है। और प्रेम से क्या बनता है? प्रेमी। यानि कि मैं। मैं क्या? मैं तो हूँ ही नहीं। प्रेम भी हटाओ।

मुहब्बत लाओ भाई। नहीं, हटाओ। शुरू से ही मज़ा नहीं आया। एक तो लंबू, ऊपर से अटकू।

इश्क़..... नहीं, इश्क़ नहीं। इश्क़ तो सिर्फ़ उस से है। वही जो एक इश्क़ के क़ाबिल है। वह जिसके इश्क़ में मैं मुसलमां से काफ़िर हो गया। मेरा मज़हब कहता था – हम उसी से आए हैं, और उसी को लौट जाएंगे। मगर मैं मानता हूँ – मैं उसी में था, उसी में हूँ, और उसी में रहूँगा। क्या आना क्या, और जाना क्या। इश्क़ भी हटाओ। फिर क्या करें?

प्यार..... हाँ, यह कुछ है। अरे! यही तो सब कुछ है। प्यार से बना प्यारी। मेरी प्यारी। यहाँ मैं नहीं हूँ। यहाँ वह है। प्यारी। मेरी प्यारी, बस। अल्लाह ने मुझे यह ज़िंदगी दी ही थी इसी लिये। कि मैं अपनी प्यारी को तलाश करूँ, उसको पाऊँ, और फिर खो दूँ। पाना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं इश्क़ को समझ सकूँ। अपने  ख़ालिक़ की क़ुदरत की ताक़त को समझ सकूँ। और उस से सही माने में इश्क़ कर सकूँ। और खोना इस लिये ज़रूरी था, कि मैं फिर प्यारी के प्यार में ही डूब कर उस से बदगुमान न हो रहूँ। मैं  उसे ही न भूल जाऊँ जो प्यारी को बनाने वाला है, और मेरे दिल में उसके लिये प्यार जगाने वाला है। जो मुझे दिल्ली ले गया। जहां वह मेरा इंतेज़ार कर रही थी। न मैं वहाँ का, न वह वहाँ की। हम कहीं और भी मिल सकते थे। लेकिन नहीं। वह मुक़द्दस ज़मीन जो सुल्तान जी और अमीर ख़ुसरो जैसे उसके आशिक़ों के आंसुओं से पाक हुई है, हमें वहीं पर मिलना था। ताकि हम  उसके इश्क़ को समझें, न कि एक दूसरे को। आज मैं उसे एक भी सजदा नहीं करता। मगर मैं जानता हूँ, कि मैं सारी उम्र सजदे में पड़ा रहूँ, तो भी वह कम है, उन चंद दिनों की बहार के लिये ही, जो उसने मुझे दी। प्यार

Thursday, October 6, 2011

ग़म दिये मुस्तक़िल.....


मेरा सितारा कई रोज़ से नज़र नहीं आ रहा था। मुझे फ़िक्र होने लगी थी।

लंबा वक़्फ़ा बीत चुका था मुझे सफ़र में। जब चला था तो जल्दी लौटने का इरादा भी न था, सो सारा इंतेज़ाम देख रख कर चला था। अभी तक तो सब ठीक ही ठाक चल रहा था। कभी कभी रौशनी कुछ मद्धम ज़रूर पड़ती थी, मगर ऐसा तो चलता ही रहता है। या कभी इतनी कम हो जाती थी कि कुछ दिनों तक वह यहाँ से नज़र ही नहीं आता था। बहुत दूर भी तो निकाल आया था मैं। लेकिन इतने लंबे समय तक तो कभी वह नज़रों से ओझल नहीं हुआ था। एक रात चौपाटी पर रेत पर लेटा अपना तारा ढूँढने की कोशिश कर ही रहा था कि हवाओं में एक आवाज़ गूँजती सुनाई पड़ी -

"ग़म दिये मुस्तक़िल, कितना नाज़ुक है, दिल ये न जाना......."

वह मेरे नज़दीक आ चुका था। कोट हाथों में झूल रहा था। पैर में जूते न थे, और सर से टोपी ग़ायब थी। अंधेरी रात में तारों की हल्की सी रौशनी में मुझे वह एक परछाईं ही नज़र आ रहा था।

"मुझे कुछ वक़्त के लिए जाना होगा कुन्दन," मैंने कहा, "तुम भी चलो न मेरे साथ।"

"मेरे इस दर्द को साथ ले जाओ... ये मुझे रात रात भर सोने नहीं देता...," वह ठहर ठहर कर बोल रहा था, "आई (उसकी माँ) के दामन में कुछ घड़ियाँ सुकून से गुज़ार तो लेता हूँ। वहाँ वो मिले, ना मिले।"

मैंने कोई जवाब न दिया। क्या जवाब दे ही सकता था। मगर उसकी माँ के दामन से मुझे अपना उपवन याद आ गया। हवाओं की सनसन और फिज़ाओं की झंझन मेरे मस्तिष्क में गुनगुनाने लगी। मैं ऊपर उस दिशा में बढ़ चला जहां मेरा तारा हुआ करता था। नीचे फिज़ाओं में उसकी आवाज़ तैर रही थी -

"उठके वो चल दिये, कहते ही रह गये, हम फ़साना....."

मैंने नीचे की तरफ देखा। उसका कोट वहीं पड़ा था, मगर वह नज़र नहीं आया। मैंने फिर ऊपर देखा। तारा तो पहले से ही ग़ायब था। मैंने अपने दिल में एक टीस सी महसूस की। एक मैं हूँ, एक घर नहीं रहा जिसके पास। एक वह है, जो लाखों दिलों में रहता है.... कमबख़्त।

Saturday, July 16, 2011

तेरे वस्त्र ही तेरी पहचान हैं.......

वह शख़्स तेज़ क़दमों से चलता मेरे सामने से गुज़र गया। मैं लगभग भागता सा कमरे से बाहर आया और उस दिशा में देखा जिधर वह सफ़ेद कपड़ों में लिपटा एक वस्त्रधारी गया था। बाबाजी की समाधि पर कोई न था। उधर के सारे कमरे व फाटक बंद थे। किसी के इतनी जल्दी दीवार कूद जाने का भी सवाल न था। और कोई दीवार कूदेगा ही क्यों? जबकि आश्रम के दरवाज़े किसी के लिए भी हर समय खुले हुये हैं। तब मैंने उस ओर देखा देखा जिधर से वह शख़्स आया था। न न । जिधर से वह आए थे। अब तक मेरे विचारों में परिवर्तन हो चुका था। उन्होंने वह रास्ता चुना था जिससे शायद वह अपने जीवन काल में आते रहे होंगे। शायद बाबाजी से मिलने। तो आज भी वह उसी गेट से अंदर दाखिल हुए, और सीधे बाबाजी की समाधि की ओर चले गए। उस गेट पर अब बड़ा सा ताला बंद रहता है। अब भी बंद था। गेट बहुत ऊंचा है। किन्तु गेट, या ताले केवल शरीर को रोक सकते हैं। अगले दिन मैंने प्रधान जी से उनके बारे में पूछा, कि कौन हो सकता था? प्रधान जी का अनुमान था कि बाबाजी तो नहीं हो सकते, क्योंकि वह सदा लाल वस्त्र धारण करते थे। सफ़ेद वस्त्रों में तो कोई और ही संत आत्मा होगी। और यह तो पवित्र आश्रम की भूमि है। यहाँ तो पवित्र आत्माओं का गुज़र होता ही रहता है।

सफ़ेद वस्त्र.... लाल वस्त्र.... यह वस्त्र ही हमारी पहचान हैं शायद। हमेशा ऐसा ही हुआ है। कि मैंने पूछा कि कल देर रात यहाँ एक स्त्री क्यों टहल रही थी? तो जवाब मिला - "कौन स्त्री? कैसी स्त्री?” फिर मेरा जवाब कि उसने ऐसे वस्त्र पहने हुए थे। "अच्छा, ऐसे वस्त्र... वह स्त्री... वह सामने वाले घर में रहा करती थी... चालीस साल पहले... उसकी मृत्यु हो गयी थी.... मगर हमने तो उसको कभी नहीं देखा।" अब मैं क्या बताऊँ कि मैंने उसे क्यूँकर देखा। अपनी उस स्थान पर बाक़ी रातों की नींदें खराब करने के लिए। और किस लिए। मगर एक बार फिर, उसकी पहचान तो उसके वस्त्रों से ही हुई। दादाजी को याद आ गया कि ऐसे कपड़े वहाँ कौन, और कब पहना करता था। अन्यथा इस घटना को भी कई अन्य घटनाओं की तरह मेरे मस्तिष्क की कल्पना मान लिया जाता। चालीस साल पहले जिस नटिनी की मृत्यु किसी गाड़ी के नीचे आ कर हुई थी, वह ऐसे ही वस्त्र धारण करती थी....

वस्त्र। इस रहस्य का समाधान मैं अभी तक नहीं कर सका हूँ। जितना ज़्यादा समझने की कोशिश की है, उतना ही उलझता गया हूँ। आत्मा का कोई आकार तो है नहीं। हमारे शरीर में निवास करती है, और फिर उसे त्याग देती है। अब वह हमारे शरीर का आकार ले ले, तो भी एक बात समझ में आती है। मगर वह हमारे वस्त्रों का आकार कैसे ले सकती है। वह हमेशा उन वस्त्रों में क्यों दिखती है, जो उसने मृत्यु के समय पहने हुए थे। हमारे वस्त्रों का हमारे शरीर से, हमारी आत्मा से, आख़िर संबंध क्या है? कोई कृपा करके बताएगा मुझे......

Friday, April 8, 2011

माना है कि तू गंगा माँ है

कुण्ड में पानी तो नहीं था. मगर ठीक बीच में एक दिये को दूसरे दिये के ऊपर इस तरह रखा गया था कि अँधेरे में नीचे वाला दिया ऊपर वाले दिये का प्रतिबिम्ब लग रहा था, और कुण्ड में पानी के होने का एहसास हो रहा था.

जब भी मैं यहाँ होता हूँ, हर शाम अँधेरा होने के बाद एक बार सती कुण्ड तक ज़रूर आता हूँ. न मालूम क्यों जो शांति मुझे घाट पर दूर तक जारी दीयों की कतारों या उनके गंगा जल में पड़ रहें प्रतिबिम्ब से नहीं मिलती, वह मुझे यहाँ सती कुण्ड में हर तरह फैले हुए दीयों से मिलती है. अक्सर यहाँ बहुत से लोग होते हैं, मगर अमूमन् कम रौशनी की वजह से कुछ साफ़ नज़र नहीं आता. बस हर तरफ दिये बिखरे होते हैं. मैं गेट के पास ही रुक जाता हूँ. अंदर नहीं जाता. दो दिये मेरे पास ही जल रहें होते हैं, और एक कतार सी शुरू होती है वहीँ से जो अंदर जाकर कुण्ड के किनारे किनारे गोलाई में फैल जाती है.

एक जगह और है जहाँ मैं अक्सर जाता हूँ. गंगा के किसी किनारे पर कोई जगह. मुझे यहाँ रास्तों के नाम नहीं पता. घाटों के नाम भी नहीं मालूम. ज़रूरत भी नहीं है मालूम करने की. मुझे जिससे काम है, उसे मैं पहचानता हूँ. उस का नाम जनता हूँ. वह मुझे हर तरफ मिल जाती है. जिस दिशा भी मैं जाऊं, वह खुद, या उसकी कोई नहर, या कोई धारा मौजूद है. उसका नाम गंगा है. वह हर तरफ अपनी हज़ार बाहें फैलाए मेरा इन्तेज़ार करती है. और मैं दीवानावार मदहोशी में किसी भी रास्ते निकाल जाऊं, वह मुझे मिल ही जाती है.

वह जगह कोई बनाया गया घाट नहीं है. किसी घाट से बाहर एक जगह पत्थर लुढ़क कर नदी में चले गए हैं, और उनमें रोक लगा कर उन्हें आगे जाने से रोक दिया गया है. सब से आगे के पत्थर तो मुख्य धारा में चले गए हैं, और कभी कभी धारा उनके ऊपर से गुज़रती है. वहाँ होने का मतलब है कि कोई भी एक गलती, या तो आप की, या पत्थर की, या पानी की; आप को धारा में खींच ले जायेगी. और फिर वापसी मुमकिन नहीं होगी. मैं उन्हीं पत्थरों पर जाकर बैठ जाता हूँ. और मैंने सिवाए अपने, कभी किसी और को वहाँ, मेरा मतलब उतना अंदर उन पत्थरों पर बैठे नहीं देखा.

गंगा का पानी अक्सर पूरे वेग से उन पत्थरों से टकराता है, और उछल कर मेरी तरफ आता है. मैं अक्सर अपने हाथ बढ़ा देता हूँ, जैसे उस पानी से कहता हूँ - आओ, मेरे हाथों को पकड़ कर दिखाओ. हाथों तक वह पहुंचे या न पहुंचे, मेरे पैरों को वह ज़रूर छूता हुआ चला जाता है. न जाने क्यों ऐसा लगता है कि मुझे छू कर निकलने वाला पानी नहीं, कोई और है. किसी के लम्स का एहसास होता है, और हर बार यह एहसास बदल जाता है. हर हाथ दूसरा होता है. गंगा अपने हज़ार हाथों से मुझे पकड़ने की कोशिश करती है, और हर बार हाथ फिसल जाते हैं. मैं अक्सर हँसने लगता हूँ. कभी कभी तो ज़ोर से भी. बातें करता हूँ गंगा से. कभी उसे गंगा कहता हूँ, तो कभी गंगे, या कभी माँ पुकारता हूँ, या मैया. लेकिन मेरे लिये वह सिर्फ बहता पानी तो हरगिज़ नहीं है.

सच तो यह है कि मैं अक्सर भूल जाता हूँ कि मैं बहुत तेज़ धारा से लग कर, उसके अंदर बैठा हुआ हूँ. मैं उन हाथों में खो जाता हूँ. फिर अचानक मुझे पानी नज़र आता है. मुझे चक्कर सा महसूस होता है. और अचानक होश सा आ जाता है. शायद इसी लिये लोग वहाँ नहीं बैठते. वहाँ हर तरफ सिर्फ पानी ही नहीं है. कुछ और भी है. वह एक न एक दिन पकड़ ही लेगा मुझे शायद. और अपने साथ ले जायेगा. ले जाये न. मुझे कब ऐतराज़ है. मैं तो खुशी से साथ जाने को तैयार हूँ. इस दुनिया में जहाँ हर कोई साथ छोड़ कर जाने को तैयार बैठा रहता है. हर अपना चला जाता है. हर दोस्त धोका देता है. बारां ने किनारा कर लिया मुझ से. जिसको मैं अब भी इस दुनिया का सब से अच्छा दोस्त, सब से अच्छा इंसान मानता हूँ. और वह है. और वह भी छोड़ कर चली गई. तो ऐसे जहाँ में गंगा माँ मुझे साथ ले जाये, और वह भी हमेशा के लिये, तो इस से ज़्यादा मुझे क्या चाहिये.

जो स्वर्ग ने दी धरती को, मैं हूँ प्यार की वोही निशानी | 
मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी ||

Monday, April 4, 2011

हज़ारों इच्छाओं और लाखों लालसाओं के साथ

एक दिया बहता हुआ मेरी तरह आ रहा था. 

पानी का बहाव तो तेज़ था. मगर न जाने क्यूँ, दिया बहुत ही धीमी गति से बहता हुआ मेरी तरफ़ आ रहा था. या मुझे ऐसा लग रहा था. अभी कल शाम को भी तो जब मैं सिन्हद्वार पर गंगा के किनारे खड़ा हुआ था तब भी मुझे बहुत दूर एक दिया बहता हुआ आता दिखाई दिया था. उसकी गति तेज़ थी. शायद नदी का बहाव काफ़ी तेज़ था जो मुझे रात के अँधेरे में नज़र नहीं आ रहा था. और देखते ही देखते वह दिया गंगा की लहरों में खो गया. दिया क्या, मैंने तो केवल एक प्रकाश-बिंदु को अपनी ओर आते देखा था. वह पास आता हुआ भी बहुत दूर था, और दूर ही कहीं गंगा की लहरों में खो गया था.

आज अभी अँधेरा नहीं हुआ था. और मैं गंगा के किनारे पानी के बिलकुल क़रीब बैठा हुआ था. और फिर मुझे एक दिया नज़र आया. जो आहिस्ता आहिस्ता नदी की लहरों पर हिचकोले खाता हुआ मेरी तरफ चला आ रहा था. वह बहुत दूर नहीं था, और मुझे उसकी लौ टिमटिमाती हुई नज़र आ रही थी. मेरे दिल में बात आई – ये डूबने न पाये. काश कल की तरह फिर न हो. यह दिया जलता हुआ मेरे पास से गुज़रे. मगर उसकी चाल तो ऐसी थी, कि जैसे वह मेरे पास आना ही नहीं चाहता था. बार बार बेचैन होकर मैं इधर उधर देखने लगता था. गंगा की लहरों में नज़रें गड़ा देता था. मेरे पास से फूल बहते हुए गुज़र रहें थे. एक बहुत ही सुन्दर सा फूलों से भरा टोकरा मेरी तरफ आया, और मेरे बहुत ही पास से निकाल गया. मैं देर तक उसे देखता रहा. फिर मैंने अपने इन्तेज़ार की तरफ आँखें घुमाईं. वह वहाँ नहीं था. वह गंगा की लहरों में खो चुका था.

जब ये दिये डूब जाते हैं, तो कहीं मेरे दिल के किसी कोने में भी कुछ डूब सा जाता है. न जाने किसकी क्या उम्मीद, क्या अरमान जुड़े हुए होंगे उस दिये के साथ. पता नहीं वह उम्मीदें, वह अरमान पूरे भी होंगे, या नहीं. वह दिया तो गंगा के विशाल आँचल में समा गया. माँ ने उसे अपने सीने में छुपा तो लिया, स्वीकार तो कर लिया. मगर माँ अपने बच्चे को हर चीज़ दे तो नहीं देती.  माँ तो पहले से ही जानती है कि उसके बच्चों को क्या चाहिये, और वह उन्हें देती भी है. मगर बच्चा भी क्या करे. उसके छोटे से मन में इच्छाएँ उमड़ती रहती हैं. लालसाएँ दबती ही नहीं. वह रोता रहता है, बिलखता है, आँसू बहाता है. और माँ अपने कामों में मगन रहती है. बच्चा थक हार कर सो जाता है. मैं भी किसी दिन यहीं कहीं सो जाऊँगा. माँ के आँचल में छुप कर. हज़ारों इच्छाओं और लाखों लालसाओं के साथ. मगर जब तक जिस्म में जान है, अरमान बाकी हैं, मांगता ही रहूँगा. पुकारता ही रहूँगा, अपनी आवाज़ के खामोश हो जाने तक. कल शाम जब दिया डूबा तो न जाने कहाँ से क़तील की बहुत पुरानी लाईनें याद आ गईं -

उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफुक़ में डूब गया |  रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी शैदाई की.