वह शख़्स तेज़ क़दमों से चलता मेरे सामने से गुज़र गया। मैं लगभग भागता सा कमरे से बाहर आया और उस दिशा में देखा जिधर वह सफ़ेद कपड़ों में लिपटा एक वस्त्रधारी गया था। बाबाजी की समाधि पर कोई न था। उधर के सारे कमरे व फाटक बंद थे। किसी के इतनी जल्दी दीवार कूद जाने का भी सवाल न था। और कोई दीवार कूदेगा ही क्यों? जबकि आश्रम के दरवाज़े किसी के लिए भी हर समय खुले हुये हैं। तब मैंने उस ओर देखा देखा जिधर से वह शख़्स आया था। न न । जिधर से वह आए थे। अब तक मेरे विचारों में परिवर्तन हो चुका था। उन्होंने वह रास्ता चुना था जिससे शायद वह अपने जीवन काल में आते रहे होंगे। शायद बाबाजी से मिलने। तो आज भी वह उसी गेट से अंदर दाखिल हुए, और सीधे बाबाजी की समाधि की ओर चले गए। उस गेट पर अब बड़ा सा ताला बंद रहता है। अब भी बंद था। गेट बहुत ऊंचा है। किन्तु गेट, या ताले केवल शरीर को रोक सकते हैं। अगले दिन मैंने प्रधान जी से उनके बारे में पूछा, कि कौन हो सकता था? प्रधान जी का अनुमान था कि बाबाजी तो नहीं हो सकते, क्योंकि वह सदा लाल वस्त्र धारण करते थे। सफ़ेद वस्त्रों में तो कोई और ही संत आत्मा होगी। और यह तो पवित्र आश्रम की भूमि है। यहाँ तो पवित्र आत्माओं का गुज़र होता ही रहता है।
सफ़ेद वस्त्र.... लाल वस्त्र.... यह वस्त्र ही हमारी पहचान हैं शायद। हमेशा ऐसा ही हुआ है। कि मैंने पूछा कि कल देर रात यहाँ एक स्त्री क्यों टहल रही थी? तो जवाब मिला - "कौन स्त्री? कैसी स्त्री?” फिर मेरा जवाब कि उसने ऐसे वस्त्र पहने हुए थे। "अच्छा, ऐसे वस्त्र... वह स्त्री... वह सामने वाले घर में रहा करती थी... चालीस साल पहले... उसकी मृत्यु हो गयी थी.... मगर हमने तो उसको कभी नहीं देखा।" अब मैं क्या बताऊँ कि मैंने उसे क्यूँकर देखा। अपनी उस स्थान पर बाक़ी रातों की नींदें खराब करने के लिए। और किस लिए। मगर एक बार फिर, उसकी पहचान तो उसके वस्त्रों से ही हुई। दादाजी को याद आ गया कि ऐसे कपड़े वहाँ कौन, और कब पहना करता था। अन्यथा इस घटना को भी कई अन्य घटनाओं की तरह मेरे मस्तिष्क की कल्पना मान लिया जाता। चालीस साल पहले जिस नटिनी की मृत्यु किसी गाड़ी के नीचे आ कर हुई थी, वह ऐसे ही वस्त्र धारण करती थी....
वस्त्र। इस रहस्य का समाधान मैं अभी तक नहीं कर सका हूँ। जितना ज़्यादा समझने की कोशिश की है, उतना ही उलझता गया हूँ। आत्मा का कोई आकार तो है नहीं। हमारे शरीर में निवास करती है, और फिर उसे त्याग देती है। अब वह हमारे शरीर का आकार ले ले, तो भी एक बात समझ में आती है। मगर वह हमारे वस्त्रों का आकार कैसे ले सकती है। वह हमेशा उन वस्त्रों में क्यों दिखती है, जो उसने मृत्यु के समय पहने हुए थे। हमारे वस्त्रों का हमारे शरीर से, हमारी आत्मा से, आख़िर संबंध क्या है? कोई कृपा करके बताएगा मुझे......