एक दिया बहता हुआ मेरी तरह आ रहा था.
पानी का बहाव तो तेज़ था. मगर न जाने क्यूँ, दिया बहुत ही धीमी गति से बहता हुआ मेरी तरफ़ आ रहा था. या मुझे ऐसा लग रहा था. अभी कल शाम को भी तो जब मैं सिन्हद्वार पर गंगा के किनारे खड़ा हुआ था तब भी मुझे बहुत दूर एक दिया बहता हुआ आता दिखाई दिया था. उसकी गति तेज़ थी. शायद नदी का बहाव काफ़ी तेज़ था जो मुझे रात के अँधेरे में नज़र नहीं आ रहा था. और देखते ही देखते वह दिया गंगा की लहरों में खो गया. दिया क्या, मैंने तो केवल एक प्रकाश-बिंदु को अपनी ओर आते देखा था. वह पास आता हुआ भी बहुत दूर था, और दूर ही कहीं गंगा की लहरों में खो गया था.
आज अभी अँधेरा नहीं हुआ था. और मैं गंगा के किनारे पानी के बिलकुल क़रीब बैठा हुआ था. और फिर मुझे एक दिया नज़र आया. जो आहिस्ता आहिस्ता नदी की लहरों पर हिचकोले खाता हुआ मेरी तरफ चला आ रहा था. वह बहुत दूर नहीं था, और मुझे उसकी लौ टिमटिमाती हुई नज़र आ रही थी. मेरे दिल में बात आई – ये डूबने न पाये. काश कल की तरह फिर न हो. यह दिया जलता हुआ मेरे पास से गुज़रे. मगर उसकी चाल तो ऐसी थी, कि जैसे वह मेरे पास आना ही नहीं चाहता था. बार बार बेचैन होकर मैं इधर उधर देखने लगता था. गंगा की लहरों में नज़रें गड़ा देता था. मेरे पास से फूल बहते हुए गुज़र रहें थे. एक बहुत ही सुन्दर सा फूलों से भरा टोकरा मेरी तरफ आया, और मेरे बहुत ही पास से निकाल गया. मैं देर तक उसे देखता रहा. फिर मैंने अपने इन्तेज़ार की तरफ आँखें घुमाईं. वह वहाँ नहीं था. वह गंगा की लहरों में खो चुका था.
जब ये दिये डूब जाते हैं, तो कहीं मेरे दिल के किसी कोने में भी कुछ डूब सा जाता है. न जाने किसकी क्या उम्मीद, क्या अरमान जुड़े हुए होंगे उस दिये के साथ. पता नहीं वह उम्मीदें, वह अरमान पूरे भी होंगे, या नहीं. वह दिया तो गंगा के विशाल आँचल में समा गया. माँ ने उसे अपने सीने में छुपा तो लिया, स्वीकार तो कर लिया. मगर माँ अपने बच्चे को हर चीज़ दे तो नहीं देती. माँ तो पहले से ही जानती है कि उसके बच्चों को क्या चाहिये, और वह उन्हें देती भी है. मगर बच्चा भी क्या करे. उसके छोटे से मन में इच्छाएँ उमड़ती रहती हैं. लालसाएँ दबती ही नहीं. वह रोता रहता है, बिलखता है, आँसू बहाता है. और माँ अपने कामों में मगन रहती है. बच्चा थक हार कर सो जाता है. मैं भी किसी दिन यहीं कहीं सो जाऊँगा. माँ के आँचल में छुप कर. हज़ारों इच्छाओं और लाखों लालसाओं के साथ. मगर जब तक जिस्म में जान है, अरमान बाकी हैं, मांगता ही रहूँगा. पुकारता ही रहूँगा, अपनी आवाज़ के खामोश हो जाने तक. कल शाम जब दिया डूबा तो न जाने कहाँ से क़तील की बहुत पुरानी लाईनें याद आ गईं -
उड़ते उड़ते आस का पंछी दूर उफुक़ में डूब गया | रोते रोते बैठ गई आवाज़ किसी शैदाई की.
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